श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथ तृतीयोऽध्यायः

राजा नाभिका चरित्र

श्रीशुक उवाच

नाभिरपत्यकामोऽप्रजया मेरुदेव्या भगवन्तं यज्ञपुरुषमवहितात्मायजत ॥ १॥

nābhirapatyakāmo'prajayā merudevyā bhagavantaṃ yajñapuruṣamavahitātmāyajata || 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! आग्नीध्रके पुत्र नाभिके कोई सन्तान न थी, इसलिये उन्होंने अपनी भार्या मेरुदेवीके सहित पुत्रकी कामनासे एकाग्रतापूर्वक भगवान् यज्ञपुरुषका यजन किया॥ १॥

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