श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! आग्नीध्रके पुत्र नाभिके कोई सन्तान न थी, इसलिये उन्होंने अपनी भार्या मेरुदेवीके सहित पुत्रकी कामनासे एकाग्रतापूर्वक भगवान् यज्ञपुरुषका यजन किया॥ १॥
नाभिरपत्यकामोऽप्रजया मेरुदेव्या भगवन्तं यज्ञपुरुषमवहितात्मायजत ॥ १॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! आग्नीध्रके पुत्र नाभिके कोई सन्तान न थी, इसलिये उन्होंने अपनी भार्या मेरुदेवीके सहित पुत्रकी कामनासे एकाग्रतापूर्वक भगवान् यज्ञपुरुषका यजन किया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.3.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 586) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/3/1/