श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.37

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-

र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।

अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि-

र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः॥ ३७

dravyakriyāhetvayaneśakartṛbhi-

rmāyāguṇairvastunirīkṣitātmane |

anvīkṣayāṅgātiśayātmabuddhibhi-

rnirastamāyākṛtaye namo namaḥ|| 37

अर्थ

विचार तथा यम-नियमादि योगांगोंके साधनसे जिनकी बुद्धि निश्‍चयात्मिका हो गयी है—वे महापुरुष द्रव्य (विषय), क्रिया (इन्द्रियोंके व्यापार), हेतु (इन्द्रियाधिष्ठाता देवता), अयन (शरीर), ईश, काल और कर्ता (अहंकार) आदि मायाके कार्योंको देखकर जिनके वास्तविक स्वरूपका निश्‍चय करते हैं ऐसे मायिक आकृतियोंसे रहित आपको बार-बार नमस्कार है॥ ३७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें