श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.36

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो

गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम्।

मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो

गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने॥ ३६

yasya svarūpaṃ kavayo vipaścito

guṇeṣu dāruṣviva jātavedasam|

mathnanti mathnā manasā didṛkṣavo

gūḍhaṃ kriyārthairnama īritātmane|| 36

अर्थ

‘ऋत्विज्गण जिस प्रकार अरणिरूप काष्ठखण्डोंमें छिपी हुई अग्‍निको मन्थनद्वारा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार कर्मासक्ति एवं कर्मफलकी कामनासे छिपे हुए जिनके रूपको देखनेकी इच्छासे परमप्रवीण पण्डितजन अपने विवेकयुक्त मनरूप मन्थनकाष्ठसे शरीर एवं इन्द्रियादिको बिलो डालते हैं। इस प्रकार मन्थन करनेपर अपने स्वरूपको प्रकट करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ३६॥

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