श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.35

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ॐ नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते॥ ३५॥

oṃ namo bhagavate mantratattvaliṅgāya yajñakratave mahādhvarāvayavāya mahāpuruṣāya namaḥ karmaśuklāya triyugāya namaste|| 35||

अर्थ

‘जिनका तत्त्व मन्त्रोंसे जाना जाता है, जो यज्ञ और क्रतुरूप हैं तथा बड़े-बड़े यज्ञ जिनके अंग हैं—उन ओंकारस्वरूप शुक्लकर्ममय त्रियुगमूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् वराहको बार-बार नमस्कार है’॥ ३५॥

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