उत्तरेषु च कुरुषु भगवान् यज्ञपुरुषः कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भूः सह कुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति॥ ३४॥
uttareṣu ca kuruṣu bhagavān yajñapuruṣaḥ kṛtavarāharūpa āste taṃ tu devī haiṣā bhūḥ saha kurubhiraskhalitabhaktiyogenopadhāvati imāṃ ca paramāmupaniṣadamāvartayati|| 34||
अर्थ
उत्तर कुरुवर्षमें भगवान् यज्ञपुरुष वराहमूर्ति धारण करके विराजमान हैं। वहाँके निवासियोंके सहित साक्षात् पृथ्वीदेवी उनकी अविचल भक्तिभावसे उपासना करती और इस परमोत्कृष्ट मन्त्रका जप करती हुई स्तुति करती हैं—॥ ३४॥
उत्तरेषु च कुरुषु भगवान् यज्ञपुरुषः कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भूः सह कुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति॥ ३४॥
उत्तर कुरुवर्षमें भगवान् यज्ञपुरुष वराहमूर्ति धारण करके विराजमान हैं। वहाँके निवासियोंके सहित साक्षात् पृथ्वीदेवी उनकी अविचल भक्तिभावसे उपासना करती और इस परमोत्कृष्ट मन्त्रका जप करती हुई स्तुति करती हैं—॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 654) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/18/34/