श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.38

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

करोति विश्‍वस्थितिसंयमोदयं

यस्येप्सितं नेप्सितमीक्षितुर्गुणैः।

माया यथाऽयो भ्रमते तदाश्रयं

ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे॥ ३८

karoti viśvasthitisaṃyamodayaṃ

yasyepsitaṃ nepsitamīkṣiturguṇaiḥ|

māyā yathā'yo bhramate tadāśrayaṃ

grāvṇo namaste guṇakarmasākṣiṇe|| 38

अर्थ

जिस प्रकार लोहा जड होनेपर भी चुम्बककी सन्‍निधिमात्रसे चलने-फिरने लगता है, उसी प्रकार जिन सर्वसाक्षीकी इच्छामात्रसे—जो अपने लिये नहीं, बल्कि समस्त प्राणियोंके लिये होती है—प्रकृति अपने गुणोंके द्वारा जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती रहती है; ऐसे सम्पूर्ण गुणों एवं कर्मोंके साक्षी आपको नमस्कार है॥ ३८॥

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