श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना

सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः।

हरावभक्तस्य कुतो महद‍्गुणा

मनोरथेनासति धावतो बहिः॥ १२

yasyāsti bhaktirbhagavatyakiñcanā

sarvairguṇaistatra samāsate surāḥ|

harāvabhaktasya kuto mahadguṇā

manorathenāsati dhāvato bahiḥ|| 12

अर्थ

जिस पुरुषकी भगवान्‌में निष्काम भक्ति है, उसके हृदयमें समस्त देवता धर्म-ज्ञानादि सम्पूर्ण सद‍्गुणोंके सहित सदा निवास करते हैं। किन्तु जो भगवान्का भक्त नहीं है, उसमें महापुरुषोंके वे गुण आ ही कहाँसे सकते हैं? वह तो तरह-तरहके संकल्प करके निरन्तर तुच्छ बाहरी विषयोंकी ओर ही दौड़ता रहता है॥ १२॥✎ 458

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #458 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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