श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

हरिर्हि साक्षाद्भगवान् शरीरिणा-

मात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम्।

हित्वा महांस्तं यदि सज्जते गृहे

तदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम्॥ १३

harirhi sākṣādbhagavān śarīriṇā-

mātmā jhaṣāṇāmiva toyamīpsitam|

hitvā mahāṃstaṃ yadi sajjate gṛhe

tadā mahattvaṃ vayasā dampatīnām|| 13

अर्थ

जैसे मछलियोंको जल अत्यन्त प्रिय—उनके जीवनका आधार होता है, उसी प्रकार साक्षात् श्रीहरि ही समस्त देहधारियोंके प्रियतम आत्मा हैं। उन्हें त्यागकर यदि कोई महत्त्वाभिमानी पुरुष घरमें आसक्त रहता है तो उस दशामें स्त्री-पुरुषोंका बड़प्पन केवल आयुको लेकर ही माना जाता है; गुणकी दृष्टिसे नहीं॥ १३॥

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