श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यत्सङ्गलब्धं निजवीर्यवैभवं

तीर्थं मुहुः संस्पृशतां हि मानसम्।

हरत्यजोऽन्तः श्रुतिभिर्गतोऽङ्गजं

को वै न सेवेत मुकुन्दविक्रमम्॥ ११

yatsaṅgalabdhaṃ nijavīryavaibhavaṃ

tīrthaṃ muhuḥ saṃspṛśatāṃ hi mānasam|

haratyajo'ntaḥ śrutibhirgato'ṅgajaṃ

ko vai na seveta mukundavikramam|| 11

अर्थ

उन भगवद्भक्तोंके संगसे भगवान्‌के तीर्थतुल्य पवित्र चरित्र सुननेको मिलते हैं, जो उनकी असाधारण शक्ति एवं प्रभावके सूचक होते हैं। उनका बार-बार सेवन करनेवालोंके कानोंके रास्तेसे भगवान् हृदयमें प्रवेश कर जाते हैं और उनके सभी प्रकारके दैहिक और मानसिक मलोंको नष्ट कर देते हैं। फिर भला, उन भगवद्भक्तोंका संग कौन न करना चाहेगा?॥ ११॥

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