श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु

सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः।

यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान्

सिद्ध्यत्यदूरान्‍न तथेन्द्रियप्रियः॥ १०

māgāradārātmajavittabandhuṣu

saṅgo yadi syādbhagavatpriyeṣu naḥ|

yaḥ prāṇavṛttyā parituṣṭa ātmavān

siddhyatyadūrānna tathendriyapriyaḥ|| 10

अर्थ

प्रभो! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई-बन्धुओंमें हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंमें ही। जो संयमी पुरुष केवल शरीर-निर्वाहके योग्य अन्‍नादिसे सन्तुष्ट रहता है, उसे जितनी शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी इन्द्रियलोलुप पुरुषको नहीं होती॥ १०॥✎ 1612

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1612 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इन्द्रिय-लोलुप → इन्द्रियलोलुप

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें