श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-

र्निरीक्षतो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते।

ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसां

कस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मनः॥ १९

na yasya māyāguṇacittavṛttibhi-

rnirīkṣato hyaṇvapi dṛṣṭirajyate|

īśe yathā no'jitamanyuraṃhasāṃ

kastaṃ na manyeta jigīṣurātmanaḥ|| 19

अर्थ

प्रभो! हमलोग क्रोधके आवेगको नहीं जीत सके हैं तथा हमारी दृष्टि तत्काल पापसे लिप्त हो जाती है। परन्तु आप तो संसारका नियमन करनेके लिये निरन्तर साक्षीरूपसे उसके सारे व्यापारोंको देखते रहते हैं। तथापि हमारी तरह आपकी दृष्टिपर उन मायिक विषयों तथा चित्तकी वृत्तियोंका नाममात्रको भी प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी स्थितिमें अपने मनको वशमें करनेकी इच्छावाला कौन पुरुष आपका आदर न करेगा?॥ १९॥✎ 456 1977

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह

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