श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

भजे भजन्यारणपादपङ्कजं

भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम्।

भक्तेष्वलं भावितभूतभावनं

भवापहं त्वा भवभावमीश्‍वरम्॥ १८

bhaje bhajanyāraṇapādapaṅkajaṃ

bhagasya kṛtsnasya paraṃ parāyaṇam|

bhakteṣvalaṃ bhāvitabhūtabhāvanaṃ

bhavāpahaṃ tvā bhavabhāvamīśvaram|| 18

अर्थ

भगवान् शंकर कहते हैं—‘ॐ जिनसे सभी गुणोंकी अभिव्यक्ति होती है, उन अनन्त और अव्यक्तमूर्ति ओंकारस्वरूप परमपुरुष श्रीभगवान्‌को नमस्कार है।’ ‘भजनीय प्रभो! आपके चरणकमल भक्तोंको आश्रय देनेवाले हैं तथा आप स्वयं सम्पूर्ण ऐश्‍वर्योंके परम आश्रय हैं। भक्तोंके सामने आप अपना भूतभावन स्वरूप पूर्णतया प्रकट कर देते हैं तथा उन्हें संसारबन्धनसे भी मुक्त कर देते हैं, किन्तु अभक्तोंको उस बन्धनमें डालते रहते हैं। आप ही सर्वेश्‍वर हैं, मैं आपका भजन करता हूँ॥ १७-१८॥✎ 456 1977

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह

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