श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

असद्दृशो यः प्रतिभाति मायया

क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचनः।

न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्रिया

यत्पादयोः स्पर्शनधर्षितेन्द्रियाः॥ २०

asaddṛśo yaḥ pratibhāti māyayā

kṣībeva madhvāsavatāmralocanaḥ|

na nāgavadhvo'rhaṇa īśire hriyā

yatpādayoḥ sparśanadharṣitendriyāḥ|| 20

अर्थ

आप जिन पुरुषोंको मधु-आसवादि पानके कारण अरुणनयन और मतवाले जान पड़ते हैं, वे मायाके वशीभूत होकर ही ऐसा मिथ्या दर्शन करते हैं तथा आपके चरणस्पर्शसे ही चित्त चंचल हो जानेके कारण नागपत्नियाँ लज्जावश आपकी पूजा करनेमें असमर्थ हो जाती हैं॥ २०॥✎ 456 1977

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह

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