श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथैकादशोऽध्यायः

राजा रहूगणको भरतजीका उपदेश

ब्राह्मण उवाच

अकोविदः कोविदवादवादान्

वदस्यथो नातिविदां१ वरिष्ठः।

न सूरयो हि व्यवहारमेनं२

तत्त्वावमर्शेन सहामनन्ति॥ १

akovidaḥ kovidavādavādān

vadasyatho nātividāṃ variṣṭhaḥ|

na sūrayo hi vyavahāramenaṃ

tattvāvamarśena sahāmananti|| 1

अर्थ

जडभरतने कहा—राजन्! तुम अज्ञानी होनेपर भी पण्डितोंके समान ऊपर-ऊपरकी तर्क-वितर्कयुक्त बात कह रहे हो। इसलिये श्रेष्ठ ज्ञानियोंमें तुम्हारी गणना नहीं हो सकती। तत्त्वज्ञानी पुरुष इस अविचारसिद्ध स्वामी-सेवक आदि व्यवहारको तत्त्वविचारके समय सत्यरूपसे स्वीकार नहीं करते॥ १॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नात्मविदां वरिष्ठः।

    (मुद्रित पृष्ठ 620)
  2. २

    प्रा० पा०—व्यवहारमेतं।

    (मुद्रित पृष्ठ 620)

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