श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.25

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

न विक्रिया विश्‍वसुहृत्सखस्य

साम्येन वीताभिमतेस्तवापि।

महद्विमानात् स्वकृताद्धि मादृङ्

नङ्क्ष्यत्यदूरादपि शूलपाणिः॥ २५

na vikriyā viśvasuhṛtsakhasya

sāmyena vītābhimatestavāpi|

mahadvimānāt svakṛtāddhi mādṛṅ

naṅkṣyatyadūrādapi śūlapāṇiḥ|| 25

अर्थ

आप देहाभिमानशून्य और विश्‍वबन्धु श्रीहरिके अनन्य भक्त हैं; इसलिये सबमें समान दृष्टि होनेसे इस मानापमानके कारण आपमें कोई विकार नहीं हो सकता तथापि एक महापुरुषका अपमान करनेके कारण मेरे-जैसा पुरुष साक्षात् त्रिशूलपाणि महादेवजीके समान प्रभावशाली होनेपर भी, अपने अपराधसे अवश्य थोड़े ही कालमें नष्ट हो जायगा’॥ २५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दशमोऽध्यायः॥ १०॥

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