श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.24

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तन्मे भवान्‍नरदेवाभिमान-

मदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य।

कृषीष्ट मैत्रीदृशमार्तबन्धो

यथा तरे सदवध्यानमंहः॥ २४

tanme bhavānnaradevābhimāna-

madena tucchīkṛtasattamasya|

kṛṣīṣṭa maitrīdṛśamārtabandho

yathā tare sadavadhyānamaṃhaḥ|| 24

अर्थ

‘दीनबन्धो! राजत्वके अभिमानसे उन्मत्त होकर मैंने आप-जैसे परम साधुकी अवज्ञा की है। अब आप ऐसी कृपादृष्टि कीजिये, जिससे इस साधु-अवज्ञारूप अपराधसे मैं मुक्त हो जाऊँ॥ २४॥

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