॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.11.2
तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-
वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।
न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः
प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधुः॥ २
tathaiva rājannurugārhamedha-
vitānavidyoruvijṛmbhiteṣu |
na vedavādeṣu hi tattvavādaḥ
prāyeṇa śuddho nu cakāsti sādhuḥ|| 2
अर्थ
लौकिक व्यवहारके समान ही वैदिक व्यवहार भी सत्य नहीं है, क्योंकि वेदवाक्य भी अधिकतर गृहस्थजनोचित यज्ञविधिके विस्तारमें ही व्यस्त हैं, राग-द्वेषादि दोषोंसे रहित विशुद्ध तत्त्वज्ञानकी पूरी-पूरी अभिव्यक्ति प्रायः उनमें भी नहीं हुई है॥ २॥