श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च

पश्याम यन्‍न व्यवहारतोऽन्यत्।

क ईश्‍वरस्तत्र किमीशितव्यं

तथापि राजन् करवाम किं ते॥ १२

viśeṣabuddhervivaraṃ manāk ca

paśyāma yanna vyavahārato'nyat|

ka īśvarastatra kimīśitavyaṃ

tathāpi rājan karavāma kiṃ te|| 12

अर्थ

‘तुम राजा हो और मैं प्रजा हूँ’ इस प्रकारकी भेदबुद्धिके लिये मुझे व्यवहारके सिवा और कहीं तनिक भी अवकाश नहीं दिखायी देता। परमार्थदृष्टिसे देखा जाय तो किसे स्वामी कहें और किसे सेवक? फिर भी राजन्! तुम्हें यदि स्वामित्वका अभिमान है तो कहो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ॥ १२॥

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