श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां

गतस्य मे वीर चिकित्सितेन।

अर्थः कियान् भवता शिक्षितेन

स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेषः॥ १३

unmattamattajaḍavatsvasaṃsthāṃ

gatasya me vīra cikitsitena|

arthaḥ kiyān bhavatā śikṣitena

stabdhapramattasya ca piṣṭapeṣaḥ|| 13

अर्थ

वीरवर! मैं मत्त, उन्मत्त और जडके समान अपनी ही स्थितिमें रहता हूँ। मेरा इलाज करके तुम्हें क्या हाथ लगेगा? यदि मैं वास्तवमें जड और प्रमादी ही हूँ, तो भी मुझे शिक्षा देना पिसे हुएको पीसनेके समान व्यर्थ ही होगा॥ १३॥

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