॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.10.11
जीवन्मृतत्वं नियमेन राजन्
आद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम्।
स्वस्वाम्यभावो ध्रुव ईड्य यत्र
तर्ह्युच्यतेऽसौ विधिकृत्ययोगः॥ ११
jīvanmṛtatvaṃ niyamena rājan
ādyantavadyadvikṛtasya dṛṣṭam|
svasvāmyabhāvo dhruva īḍya yatra
tarhyucyate'sau vidhikṛtyayogaḥ|| 11
अर्थ
राजन्! तुमने जो जीने-मरनेकी बात कही—सो जितने भी विकारी पदार्थ हैं, उन सभीमें नियमितरूपसे ये दोनों बातें देखी जाती हैं; क्योंकि वे सभी आदि-अन्तवाले हैं। यशस्वी नरेश! जहाँ स्वामी-सेवकभाव स्थिर हो, वहीं आज्ञापालनादिका नियम भी लागू हो सकता है॥ ११॥