श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यद्वाचि तन्त्यां गुणकर्मदामभिः

सुदुस्तरैर्वत्स वयं सुयोजिताः।

सर्वे वहामो बलिमीश्‍वराय

प्रोता नसीव द्विपदे चतुष्पदः॥ १४

yadvāci tantyāṃ guṇakarmadāmabhiḥ

sudustarairvatsa vayaṃ suyojitāḥ|

sarve vahāmo balimīśvarāya

protā nasīva dvipade catuṣpadaḥ|| 14

अर्थ

वत्स! जिस प्रकार रस्सीसे नथा हुआ पशु मनुष्योंका बोझ ढोता है, उसी प्रकार परमात्माकी वेदवाणीरूप बड़ी रस्सीमें सत्त्वादि गुण, सात्त्विक आदि कर्म और उनके ब्राह्मणादि वाक्योंकी मजबूत डोरीसे जकड़े हुए हम सब लोग उन्हींके इच्छानुसार कर्ममें लगे रहते हैं और उसके द्वारा उनकी पूजा करते रहते हैं॥ १४॥

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