॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.1.15
ईशाभिसृष्टं ह्यवरुन्ध्महेऽङ्ग
दुःखं सुखं वा गुणकर्मसङ्गात्।
आस्थाय तत्तद्यदयुङ्क्त नाथ-
श्चक्षुष्मतान्धा इव नीयमानाः॥ १५
īśābhisṛṣṭaṃ hyavarundhmahe'ṅga
duḥkhaṃ sukhaṃ vā guṇakarmasaṅgāt|
āsthāya tattadyadayuṅkta nātha-
ścakṣuṣmatāndhā iva nīyamānāḥ|| 15
अर्थ
हमारे गुण और कर्मोंके अनुसार प्रभुने हमें जिस योनिमें डाल दिया है उसीको स्वीकार करके, वे जैसी व्यवस्था करते हैं उसीके अनुसार हम सुख या दुःख भोगते रहते हैं। हमें उनकी इच्छाका उसी प्रकार अनुसरण करना पड़ता है, जैसे किसी अंधेको आँखवाले पुरुषका॥ १५॥