॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.1.13
भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं
शोकाय मोहाय सदा भयाय।
सुखाय दुःखाय च देहयोग-
मव्यक्तदिष्टं जनताङ्ग धत्ते॥ १३
bhavāya nāśāya ca karma kartuṃ
śokāya mohāya sadā bhayāya|
sukhāya duḥkhāya ca dehayoga-
mavyaktadiṣṭaṃ janatāṅga dhatte|| 13
अर्थ
प्रियवर! उसी अव्यक्त ईश्वरके दिये हुए शरीरको सब जीव जन्म, मरण, शोक, मोह, भय और सुख-दुःखका भोग करने तथा कर्म करनेके लिये सदा धारण करते हैं॥ १३॥