श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं

शोकाय मोहाय सदा भयाय।

सुखाय दुःखाय च देहयोग-

मव्यक्तदिष्टं जनताङ्ग धत्ते॥ १३

bhavāya nāśāya ca karma kartuṃ

śokāya mohāya sadā bhayāya|

sukhāya duḥkhāya ca dehayoga-

mavyaktadiṣṭaṃ janatāṅga dhatte|| 13

अर्थ

प्रियवर! उसी अव्यक्त ईश्‍वरके दिये हुए शरीरको सब जीव जन्म, मरण, शोक, मोह, भय और सुख-दुःखका भोग करने तथा कर्म करनेके लिये सदा धारण करते हैं॥ १३॥

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