श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

न तस्य कश्चित्तपसा विद्यया वा

न योगवीर्येण मनीषया वा।

नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा ✎ 2171

कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात्॥ १२ ✎ 2171

na tasya kaścittapasā vidyayā vā

na yogavīryeṇa manīṣayā vā|

naivārthadharmaiḥ parataḥ svato vā

kṛtaṃ vihantuṃ tanubhṛdvibhūyāt|| 12

अर्थ

उनके विधानको कोई भी देहधारी न तो तप, विद्या, योगबल या बुद्धिबलसे, न अर्थ या धर्मकी शक्तिसे और न स्वयं या किसी दूसरेकी सहायतासे ही टाल सकता है॥ १२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2171 छूटा या अधिक पाठ: नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा कृतं / विहन्तुं तनुभृद्विभूयात्॥ १२ → नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा / कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात्॥ १२

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