श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

निबोध तातेदमृतं ब्रवीमि

मासूयितुं देवमर्हस्यप्रमेयम्।

वयं भवस्ते तत एष महर्षि-

र्वहाम सर्वे विवशा यस्य दिष्टम्॥ ११

nibodha tātedamṛtaṃ bravīmi

māsūyituṃ devamarhasyaprameyam|

vayaṃ bhavaste tata eṣa maharṣi-

rvahāma sarve vivaśā yasya diṣṭam|| 11

अर्थ

श्रीब्रह्माजीने कहा—बेटा! मैं तुमसे सत्य सिद्धान्तकी बात कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। तुम्हें अप्रमेय श्रीहरिके प्रति किसी प्रकारकी दोषदृष्टि नहीं रखनी चाहिये। तुम्हीं क्या—हम, महादेवजी, तुम्हारे पिता स्वायम्भुव मनु और तुम्हारे गुरु ये महर्षि नारद भी विवश होकर उन्हींकी आज्ञाका पालन करते हैं॥ ११॥

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