जिस प्रकार जल स्वयं ही नीचेकी ओर बहने लगता है—उसी प्रकार मैत्री आदि गुणोंके कारण जिसपर श्रीभगवान् प्रसन्न हो जाते हैं, उसके आगे सभी जीव झुक जाते हैं॥ ४७॥✎ 1962
यस्य प्रसन्नो भगवान् गुणैर्मैत्र्यादिभिर्हरिः।
तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम्॥ ४७
जिस प्रकार जल स्वयं ही नीचेकी ओर बहने लगता है—उसी प्रकार मैत्री आदि गुणोंके कारण जिसपर श्रीभगवान् प्रसन्न हो जाते हैं, उसके आगे सभी जीव झुक जाते हैं॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 458) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी