इधर उत्तम और ध्रुव दोनों ही प्रेमसे विह्वल होकर मिले। एक- दूसरेके अंगोंका स्पर्श पाकर उन दोनोंके ही शरीरमें रोमांच हो आया तथा नेत्रोंसे बार-बार आँसुओंकी धारा बहने लगी॥ ४८॥✎ 1962
उत्तमश्च ध्रुवश्चोभावन्योन्यं प्रेमविह्वलौ।
अंगसंगादुत्पुलकावस्रौघं मुहुरूहतुः॥ ४८
इधर उत्तम और ध्रुव दोनों ही प्रेमसे विह्वल होकर मिले। एक- दूसरेके अंगोंका स्पर्श पाकर उन दोनोंके ही शरीरमें रोमांच हो आया तथा नेत्रोंसे बार-बार आँसुओंकी धारा बहने लगी॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 458) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/9/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी