श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ततो गन्तासि मत्स्थानं सर्वलोकनमस्कृतम्।

उपरिष्टादृषिभ्यस्त्वं यतो नावर्तते गतः॥ २५

tato gantāsi matsthānaṃ sarvalokanamaskṛtam|

upariṣṭādṛṣibhyastvaṃ yato nāvartate gataḥ|| 25

अर्थ

इससे तू अन्तमें सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और सप्तर्षियोंसे भी ऊपर मेरे निज धामको जायगा, जहाँ पहुँच जानेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना होता है॥ २५॥

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