भुक्त्वा चेहाशिषः सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि॥ २४
iṣṭvā māṃ yajñahṛdayaṃ yajñaiḥ puṣkaladakṣiṇaiḥ|
bhuktvā cehāśiṣaḥ satyā ante māṃ saṃsmariṣyasi|| 24
अर्थ
यज्ञ मेरी प्रिय मूर्ति है, तू अनेकों बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करेगा तथा यहाँ उत्तम-उत्तम भोग भोगकर अन्तमें मेरा ही स्मरण करेगा॥ २४॥
इष्ट्वा मां यज्ञहृदयं यज्ञैः पुष्कलदक्षिणैः।
भुक्त्वा चेहाशिषः सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि॥ २४
यज्ञ मेरी प्रिय मूर्ति है, तू अनेकों बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करेगा तथा यहाँ उत्तम-उत्तम भोग भोगकर अन्तमें मेरा ही स्मरण करेगा॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 455) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/24/