श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नान्यैरधिष्ठितं भ१द्र यद‍्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षि२ति।✎ 1027

यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम्॥ २०

nānyairadhiṣṭhitaṃ bhadra yadbhrājiṣṇu dhruvakṣiti|

yatra graharkṣatārāṇāṃ jyotiṣāṃ cakramāhitam|| 20

अर्थ

भद्र! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागणरूप ज्योतिश्‍चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता रहता है जिस प्रकार मेढीके* चारों ओर दँवरीके बैल घूमते रहते हैं। अवान्तर कल्पपर्यन्त रहनेवाले अन्य लोकोंका नाश हो जानेपर भी जो स्थिर रहता है तथा तारागणके सहित धर्म, अग्‍नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र एवं सप्तर्षिगण जिसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, वह ध्रुवलोक मैं तुझे देता हूँ॥ २०-२१॥

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तत्र।

    (मुद्रित पृष्ठ 455)
  2. २

    प्रा० पा०—स्थिति।

    (मुद्रित पृष्ठ 455)
  3. *

    कटी हुई फसल धान-गेहूँ आदिको कुचलनेके लिये घुमाये जानेवाले बैल जिस खंभेमें बँधे रहते हैं, उसका नाम मेढी है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 455)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1027 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भ्र → भ

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें