॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.56
लब्ध्वा द्रव्यमयीमर्चां क्षित्यम्ब्वादिषु वार्चयेत्।
आभृतात्मा मुनिः शान्तो यतवाङ्मितवन्यभुक्॥ ५६
labdhvā dravyamayīmarcāṃ kṣityambvādiṣu vārcayet|
ābhṛtātmā muniḥ śānto yatavāṅmitavanyabhuk|| 56
अर्थ
यदि शिला आदिकी मूर्ति मिल सके तो उसमें, नहीं तो पृथ्वी या जल आदिमें ही भगवान्की पूजा करे। सर्वदा संयतचित्त, मननशील, शान्त और मौन रहे तथा जंगली फल-मूलादिका परिमित आहार करे॥ ५६॥✎ 371