॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.55
सलिलैः शुचिभिर्माल्यैर्वन्यैर्मूलफलादिभिः।
शस्ताङ्कुरांशुकैश्चार्चेत्तुलस्या प्रियया प्रभुम्॥ ५५
salilaiḥ śucibhirmālyairvanyairmūlaphalādibhiḥ|
śastāṅkurāṃśukaiścārcettulasyā priyayā prabhum|| 55
अर्थ
प्रभुका पूजन विशुद्ध जल, पुष्पमाला, जंगली मूल और फलादि, पूजामें विहित दूर्वादि अंकुर, वनमें ही प्राप्त होनेवाले वल्कल वस्त्र और उनकी प्रेयसी तुलसीसे करना चाहिये॥ ५५॥✎ 371