इसके सिवा पुण्यकीर्ति श्रीहरि अपनी अनिर्वचनीया मायाके द्वारा अपनी ही इच्छासे अवतार लेकर जो-जो मनोहर चरित्र करनेवाले हैं, उनका मन-ही-मन चिन्तन करता रहे॥ ५७॥✎ 371
स्वेच्छावतारचरितैरचिन्त्यनिजमायया ।
करिष्यत्युत्तमश्लोकस्तद्ध्यायेद्धृदयंगमम् ॥ ५७
इसके सिवा पुण्यकीर्ति श्रीहरि अपनी अनिर्वचनीया मायाके द्वारा अपनी ही इच्छासे अवतार लेकर जो-जो मनोहर चरित्र करनेवाले हैं, उनका मन-ही-मन चिन्तन करता रहे॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 449) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)