॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.2
mṛṣādharmasya bhāryā''sīddambhaṃ māyāṃ ca śatruhan|
asūta mithunaṃ tattu nir:ṛtirjagṛhe'prajaḥ|| 2
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—शत्रुसूदन विदुरजी! सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति—ब्रह्माजीके इन नैष्ठिक ब्रह्मचारी पुत्रोंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश नहीं किया (अतः उनके कोई सन्तान नहीं हुई)। अधर्म भी ब्रह्माजीका ही पुत्र था, उसकी पत्नीका नाम था मृषा। उसके दम्भ नामक पुत्र और माया नामकी कन्या हुई। उन दोनोंको निर्ऋति ले गया, क्योंकि उसके कोई सन्तान न थी॥ १-२॥✎ 1321 1322