श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

योऽसौ मयाविदिततत्त्वदृशा सभायां

क्षिप्तो दुरुक्तिविशिखैरगणय्य तन्माम्।

अर्वाक् पतन्तमर्हत्तमनिन्दयापाद्

दृष्ट्याऽऽर्द्रया स भगवान् स्वकृतेन तुष्येत्॥ १५

yo'sau mayāviditatattvadṛśā sabhāyāṃ

kṣipto duruktiviśikhairagaṇayya tanmām|

arvāk patantamarhattamanindayāpād

dṛṣṭyā''rdrayā sa bhagavān svakṛtena tuṣyet|| 15

अर्थ

मैं आपके तत्त्वको नहीं जानता था, इसीसे मैंने भरी सभामें आपको अपने वाग्बाणोंसे बेधा था। किन्तु आपने मेरे उस अपराधका कोई विचार नहीं किया। मैं तो आप-जैसे पूज्यतम महानुभावोंका अपराध करनेके कारण नरकादि नीच लोकोंमें गिरनेवाला था, परन्तु आपने अपनी करुणाभरी दृष्टिसे मुझे उबार लिया। अब भी आपको प्रसन्‍न करनेयोग्य मुझमें कोई गुण नहीं है; बस, आप अपने ही उदारतापूर्ण बर्तावसे मुझपर प्रसन्‍न हों॥ १५॥

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