श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

विद्यातपोव्रतधरान् मुखतः स्म विप्रान्

ब्रह्माऽऽत्मतत्त्वमवितुं प्रथमं त्वमस्राक्।

तद‍्ब्राह्मणान् परम सर्वविपत्सु पासि

पालः पशूनिव विभो प्रगृहीतदण्डः॥ १४

vidyātapovratadharān mukhataḥ sma viprān

brahmā''tmatattvamavituṃ prathamaṃ tvamasrāk|

tadbrāhmaṇān parama sarvavipatsu pāsi

pālaḥ paśūniva vibho pragṛhītadaṇḍaḥ|| 14

अर्थ

विभो! आपने ब्रह्मा होकर सबसे पहले आत्मतत्त्वकी रक्षाके लिये अपने मुखसे विद्या, तप और व्रतादिके धारण करनेवाले ब्राह्मणोंको उत्पन्‍न किया था। जैसे चरवाहा लाठी लेकर गौओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप उन ब्राह्मणोंकी सब विपत्तियोंसे रक्षा करते हैं॥ १४॥

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