श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

दक्ष उवाच

भूयाननुग्रह अहो भवता कृतो मे

दण्डस्त्वया मयि भृतो यदपि प्रलब्धः।

न ब्रह्मबन्धुषु च वां भगवन्‍नवज्ञा

तुभ्यं हरेश्‍च कुत एव धृतव्रतेषु॥ १३

bhūyānanugraha aho bhavatā kṛto me

daṇḍastvayā mayi bhṛto yadapi pralabdhaḥ|

na brahmabandhuṣu ca vāṃ bhagavannavajñā

tubhyaṃ hareśca kuta eva dhṛtavrateṣu|| 13

अर्थ

दक्षने कहा—भगवन्! मैंने आपका अपराध किया था, किन्तु आपने उसके बदलेमें मुझे दण्डके द्वारा शिक्षा देकर बड़ा ही अनुग्रह किया है। अहो! आप और श्रीहरि तो आचारहीन, नाममात्रके ब्राह्मणोंकी भी उपेक्षा नहीं करते—फिर हम-जैसे यज्ञ-यागादि करनेवालोंको क्यों भूलेंगे॥ १३॥

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