श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कुर्वध्वरस्योद्धरणं हतस्य भो-

स्त्वयासमाप्तस्य मनो प्रजापतेः।

न यत्र भागं तव भागिनो ददुः

कुयज्विनो येन मखो निनीयते॥ ५०

kurvadhvarasyoddharaṇaṃ hatasya bho-

stvayāsamāptasya mano prajāpateḥ|

na yatra bhāgaṃ tava bhāgino daduḥ

kuyajvino yena makho ninīyate|| 50

अर्थ

भगवन्! आप सबके मूल हैं। आप ही सम्पूर्ण यज्ञोंको पूर्ण करनेवाले हैं। यज्ञभाग पानेका भी आपको पूरा अधिकार है। फिर भी इस दक्षयज्ञके बुद्धिहीन याजकोंने आपको यज्ञभाग नहीं दिया। इसीसे यह आपके द्वारा विध्वस्त हुआ। अब आप इस अपूर्ण यज्ञका पुनरुद्धार करनेकी कृपा करें॥ ५०॥

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