भगवन्! आप सबके मूल हैं। आप ही सम्पूर्ण यज्ञोंको पूर्ण करनेवाले हैं। यज्ञभाग पानेका भी आपको पूरा अधिकार है। फिर भी इस दक्षयज्ञके बुद्धिहीन याजकोंने आपको यज्ञभाग नहीं दिया। इसीसे यह आपके द्वारा विध्वस्त हुआ। अब आप इस अपूर्ण यज्ञका पुनरुद्धार करनेकी कृपा करें॥ ५०॥
कुर्वध्वरस्योद्धरणं हतस्य भो-
स्त्वयासमाप्तस्य मनो प्रजापतेः।
न यत्र भागं तव भागिनो ददुः
कुयज्विनो येन मखो निनीयते॥ ५०
भगवन्! आप सबके मूल हैं। आप ही सम्पूर्ण यज्ञोंको पूर्ण करनेवाले हैं। यज्ञभाग पानेका भी आपको पूरा अधिकार है। फिर भी इस दक्षयज्ञके बुद्धिहीन याजकोंने आपको यज्ञभाग नहीं दिया। इसीसे यह आपके द्वारा विध्वस्त हुआ। अब आप इस अपूर्ण यज्ञका पुनरुद्धार करनेकी कृपा करें॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 433) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/50/