॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.6.51
जीवताद्यजमानोऽयं प्रपद्येताक्षिणी भगः।
भृगोः श्मश्रूणि रोहन्तु पूष्णो दन्ताश्च पूर्ववत्॥ ५१
jīvatādyajamāno'yaṃ prapadyetākṣiṇī bhagaḥ|
bhṛgoḥ śmaśrūṇi rohantu pūṣṇo dantāśca pūrvavat|| 51
अर्थ
प्रभो! ऐसा कीजिये, जिससे यजमान दक्ष फिर जी उठे, भगदेवताको नेत्र मिल जायँ, भृगुजीके दाढ़ी-मूँछ आ जायँ और पूषाके पहलेके ही समान दाँत निकल आयें॥ ५१॥