॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.6.49
भवांस्तु पुंसः परमस्य मायया
दुरन्तयास्पृष्टमतिः समस्तदृक्।
तया हतात्मस्वनुकर्मचेत-
स्स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हसि प्रभो॥ ४९
bhavāṃstu puṃsaḥ paramasya māyayā
durantayāspṛṣṭamatiḥ samastadṛk|
tayā hatātmasvanukarmaceta-
ssvanugrahaṃ kartumihārhasi prabho|| 49
अर्थ
प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, परम पुरुष भगवान्की दुस्तर मायाने आपकी बुद्धिका स्पर्श भी नहीं किया है। अतः जिनका चित्त उसके वशीभूत होकर कर्ममार्गमें आसक्त हो रहा है, उनके द्वारा अपराध बन जाय, तो भी उनपर आपको कृपा ही करनी चाहिये॥ ४९॥✎ 360