श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.40

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं

सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्‌घ्रिः ।

उत्थाय चक्रे शिरसाभिवन्दन-

मर्हत्तमः कस्य यथैव विष्णुः॥ ४०

sa tūpalabhyāgatamātmayoniṃ

surāsureśairabhivanditāṅghriḥ |

utthāya cakre śirasābhivandana-

marhattamaḥ kasya yathaiva viṣṇuḥ|| 40

अर्थ

यद्यपि समस्त देवता और दैत्योंके अधिपति भी श्रीमहादेवजीके चरणकमलोंकी वन्दना करते हैं, तथापि वे श्रीब्रह्माजीको अपने स्थानपर आया देख तुरंत खड़े हो गये और जैसे वामनावतारमें परमपूज्य विष्णुभगवान् कश्यपजीकी वन्दना करते हैं, उसी प्रकार सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ४०॥✎ 359 1319 1320

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #359 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से, → भगवान्‌से,
  • #1319 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महर्षियों-सहित → महर्षियोंसहित
  • #1320 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वामना-वतारमें → वामनावतारमें

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