वे योगपट्ट (काठकी बनी हुई टेकनी)-का सहारा लिये एकाग्रचित्तसे ब्रह्मानन्दका अनुभव कर रहे थे। लोकपालोंके सहित समस्त मुनियोंने मननशीलोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान् शंकरको हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥ ३९॥✎ 35913191320
तं ब्रह्मनिर्वाणसमाधिमाश्रितं
व्युपाश्रितं गिरिशं योगकक्षाम्।
सलोकपाला मुनयो मनूना-
माद्यं मनुं प्रांजलयः प्रणेमुः॥ ३९
वे योगपट्ट (काठकी बनी हुई टेकनी)-का सहारा लिये एकाग्रचित्तसे ब्रह्मानन्दका अनुभव कर रहे थे। लोकपालोंके सहित समस्त मुनियोंने मननशीलोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान् शंकरको हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 432) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/6/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#359 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से, → भगवान्से,
#1319 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महर्षियों-सहित → महर्षियोंसहित
#1320 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वामना-वतारमें → वामनावतारमें