श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.39

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तं ब्रह्मनिर्वाणसमाधिमाश्रितं

व्युपाश्रितं गिरिशं योगकक्षाम्।

सलोकपाला मुनयो मनूना-

माद्यं मनुं प्रांजलयः प्रणेमुः॥ ३९

taṃ brahmanirvāṇasamādhimāśritaṃ

vyupāśritaṃ giriśaṃ yogakakṣām|

salokapālā munayo manūnā-

mādyaṃ manuṃ prāṃjalayaḥ praṇemuḥ|| 39

अर्थ

वे योगपट्ट (काठकी बनी हुई टेकनी)-का सहारा लिये एकाग्रचित्तसे ब्रह्मानन्दका अनुभव कर रहे थे। लोकपालोंके सहित समस्त मुनियोंने मननशीलोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान् शंकरको हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥ ३९॥✎ 359 1319 1320

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #359 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से, → भगवान्‌से,
  • #1319 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महर्षियों-सहित → महर्षियोंसहित
  • #1320 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वामना-वतारमें → वामनावतारमें

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