विदुरजी कहने लगे—महायोगिन्! आप बड़े ही करुणामय हैं। आज आपने मुझे अज्ञानान्धकारके उस पार पहुँचा दिया है, जहाँ अकिंचनोंके सर्वस्व श्रीहरि विराजते हैं॥ २९॥
सोऽयमद्य महायोगिन् भवता करुणात्मना।
दर्शितस्तमसः पारो यत्राकिञ्चनगो हरिः॥ २९
विदुरजी कहने लगे—महायोगिन्! आप बड़े ही करुणामय हैं। आज आपने मुझे अज्ञानान्धकारके उस पार पहुँचा दिया है, जहाँ अकिंचनोंके सर्वस्व श्रीहरि विराजते हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 574) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/29/