श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

विदुर उवाच

सोऽयमद्य महायोगिन् भवता करुणात्मना।

दर्शितस्तमसः पारो यत्राकिञ्चनगो हरिः॥ २९

so'yamadya mahāyogin bhavatā karuṇātmanā|

darśitastamasaḥ pāro yatrākiñcanago hariḥ|| 29

अर्थ

विदुरजी कहने लगे—महायोगिन्! आप बड़े ही करुणामय हैं। आज आपने मुझे अज्ञानान्धकारके उस पार पहुँचा दिया है, जहाँ अकिंचनोंके सर्वस्व श्रीहरि विराजते हैं॥ २९॥

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