श्रीशुकदेवजी कहते हैं—मैत्रेयजीको उपर्युक्त कृतज्ञता सूचक वचन कहकर तथा प्रणाम कर विदुरजीने उनसे आज्ञा ली और फिर शान्तचित्त होकर अपने बन्धुजनोंसे मिलनेके लिये वे हस्तिनापुर चले गये॥ ३०॥
इत्यानम्य तमामन्त्र्य विदुरो गजसाह्वयम्।
स्वानां दिदृक्षुः प्रययौ ज्ञातीनां निर्वृताशयः॥ ३०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—मैत्रेयजीको उपर्युक्त कृतज्ञता सूचक वचन कहकर तथा प्रणाम कर विदुरजीने उनसे आज्ञा ली और फिर शान्तचित्त होकर अपने बन्धुजनोंसे मिलनेके लिये वे हस्तिनापुर चले गये॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 574) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/30/