श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

इमां तु कौषारविणोपवर्णितां क्षत्ता निशम्याजितवादसत्कथाम्।

प्रवृद्धभावोऽश्रुकलाकुलो३ मुनेर्दधार मूर्ध्ना चरणं हृदा हरेः॥ २८✎ 1532

imāṃ tu kauṣāraviṇopavarṇitāṃ kṣattā niśamyājitavādasatkathām|

pravṛddhabhāvo'śrukalākulo munerdadhāra mūrdhnā caraṇaṃ hṛdā hareḥ|| 28

अर्थ

राजन्! इधर श्रीमैत्रेयजीके मुखसे यह भगवद्-गुणानुवादयुक्त पवित्र कथा सुनकर विदुरजी प्रेममग्न हो गये, भक्तिभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्रोंसे पवित्र आँसुओंकी धारा बहने लगी तथा उन्होंने हृदयमें भगवच्चरणोंका स्मरण करते हुए अपना मस्तक मुनिवर मैत्रेयजीके चरणोंपर रख दिया॥ २८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—भावाश्रु०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 574)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1532 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मुने-र्दधार → मुनेर्दधार

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