श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा।

प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद्यत्र जाजलिः॥ २

dīkṣitā brahmasatreṇa sarvabhūtātmamedhasā|

pratīcyāṃ diśi velāyāṃ siddho'bhūdyatra jājaliḥ|| 2

अर्थ

वे पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर—जहाँ जाजलि मुनिने सिद्धि प्राप्त की थी—जा पहुँचे और जिससे ‘समस्त भूतोंमें एक ही आत्मतत्त्व विराजमान है’ ऐसा ज्ञान होता है, उस आत्मविचाररूप ब्रह्मसत्रका संकल्प करके बैठ गये॥ २॥

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