श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तान्‍निर्जितप्राणमनोवचोदृशो

जितासनान् शान्तसमानविग्रहान्।

परेऽमले ब्रह्मणि योजितात्मनः

सुरासुरेड्यो ददृशे स्म नारदः॥ ३

tānnirjitaprāṇamanovacodṛśo

jitāsanān śāntasamānavigrahān|

pare'male brahmaṇi yojitātmanaḥ

surāsureḍyo dadṛśe sma nāradaḥ|| 3

अर्थ

उन्होंने प्राण, मन, वाणी और दृष्टिको वशमें किया तथा शरीरको निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसनको जीतकर चित्तको विशुद्ध परब्रह्ममें लीन कर दिया। ऐसी स्थितिमें उन्हें देवता और असुर दोनोंके ही वन्दनीय श्रीनारदजीने देखा॥ ३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें