॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.31.3
तान्निर्जितप्राणमनोवचोदृशो
जितासनान् शान्तसमानविग्रहान्।
परेऽमले ब्रह्मणि योजितात्मनः
सुरासुरेड्यो ददृशे स्म नारदः॥ ३
tānnirjitaprāṇamanovacodṛśo
jitāsanān śāntasamānavigrahān|
pare'male brahmaṇi yojitātmanaḥ
surāsureḍyo dadṛśe sma nāradaḥ|| 3
अर्थ
उन्होंने प्राण, मन, वाणी और दृष्टिको वशमें किया तथा शरीरको निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसनको जीतकर चित्तको विशुद्ध परब्रह्ममें लीन कर दिया। ऐसी स्थितिमें उन्हें देवता और असुर दोनोंके ही वन्दनीय श्रीनारदजीने देखा॥ ३॥