श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दस लाख वर्ष बीत जानेपर जब प्रचेताओंको विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान्के वाक्योंकी याद आयी और वे अपनी भार्या मारिषाको पुत्रके पास छोड़कर तुरंत घरसे निकल पड़े॥ १॥
तत उत्पन्नविज्ञाना आश्वधोक्षजभाषितम्।
स्मरन्त आत्मजे भार्यां विसृज्य प्राव्रजन् गृहात्॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दस लाख वर्ष बीत जानेपर जब प्रचेताओंको विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान्के वाक्योंकी याद आयी और वे अपनी भार्या मारिषाको पुत्रके पास छोड़कर तुरंत घरसे निकल पड़े॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 570) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/1/