श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

एतत्पदं तज्जगदात्मनः परं

सकृद्विभातं सवितुर्यथा प्रभा।

यथासवो जाग्रति सुप्तशक्तयो

द्रव्यक्रियाज्ञानभिदाभ्रमात्ययः॥ १६

etatpadaṃ tajjagadātmanaḥ paraṃ

sakṛdvibhātaṃ savituryathā prabhā|

yathāsavo jāgrati suptaśaktayo

dravyakriyājñānabhidābhramātyayaḥ|| 16

अर्थ

वस्तुतः यह विश्‍वात्मा श्रीभगवान्‌का वह शास्त्रप्रसिद्ध सर्वोपाधिरहित स्वरूप ही है। जैसे सूर्यकी प्रभा उससे भिन्‍न नहीं होती, उसी प्रकार कभी-कभी गन्धर्व-नगरके समान स्फुरित होनेवाला यह जगत् भगवान्‌से भिन्‍न नहीं है; तथा जैसे जाग्रत् अवस्थामें इन्द्रियाँ क्रियाशील रहती हैं किन्तु सुषुप्तिमें उनकी शक्तियाँ लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह जगत् सर्गकालमें भगवान्‌से प्रकट हो जाता है और कल्पान्त होनेपर उन्हींमें लीन हो जाता है। स्वरूपतः तो भगवान्‌में द्रव्य, क्रिया और ज्ञानरूपी त्रिविध अहंकारके कार्योंकी तथा उनके निमित्तसे होनेवाले भेदभ्रमकी सत्ता है ही नहीं॥ १६॥✎ 428 429 430

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #428 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #429 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #430 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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