॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.31.17
यथा नभस्यभ्रतमःप्रकाशा
भवन्ति भूपा न भवन्त्यनुक्रमात्।
एवं परे ब्रह्मणि शक्तयस्त्वमू
रजस्तमःसत्त्वमिति प्रवाहः॥ १७
yathā nabhasyabhratamaḥprakāśā
bhavanti bhūpā na bhavantyanukramāt|
evaṃ pare brahmaṇi śaktayastvamū
rajastamaḥsattvamiti pravāhaḥ|| 17
अर्थ
नृपतिगण! जैसे बादल, अन्धकार और प्रकाश—ये क्रमशः आकाशसे प्रकट होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं; किन्तु आकाश इनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ये सत्त्व, रज, और तमोमयी शक्तियाँ कभी परब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं और कभी उसीमें लीन हो जाती हैं। इसी प्रकार इनका प्रवाह चलता रहता है; किन्तु इससे आकाशके समान असंग परमात्मामें कोई विकार नहीं होता॥ १७॥✎ 428 429 430